शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

परिधि

 
आज फिर
एक भ्रम
एक स्वप्न जो
अक्सर दिखाई देता है,
तुम्हारा वजूद,
अक्सर
महसूस करती हूँ
अपने समीप, बहुत समीप
यही तो जीना है
कि, कल्पना उसके
होने की
जो छिपा है
विस्तृत, अक्षेर वातायन में
मोरपंख - सा
भागना उसके पीछे
जो छोड़ जाता है ---------------
एक दीर्घकालिक प्रतीक्षा
उससे कुछ सुन पाने की आशा
जो, बिलकुल पास
होकर भी
मौन की परिधि
में लिप्त रहता है
 
और,
मछुए के जाल की तरह
फैला असीम अन्तरिक्ष
हमारे मध्य
स्थापित रहता है
सदैव ......सदैव....
 
क्या इसका सदा मौजूद रहना
मिथ्या भ्रम नहीं हो सकता ?
क्यूँ नहीं सम्क्झा पाती हूँ
तुम्हे ?
मैं तो हरसिंगार का पेड़ हूँ
बस, एक बार हिलाकर देखो
झरते हुए सारे फूल तुम्हारे ही हैं..
मेरा अस्तित्व भी
तुम्हारा ही है |
पर,
यह स्वप्न ही रहा
यह परिधि लांघी नहीं जा सकती
क्यूंकि वो फिर से बाँध देगा...
शब्दों की एक
सुन्दर सी भूमिका
और,
व्याप्त हो जायेगा
पुनश्च :
 
मौन- हमारे मध्य
नहीं..
मैं, अपने स्वप्न
बर्फ की तरह
ठोस नहीं बनाना चाहती
बेहतर होगा...
मैं प्रतीक्षारत रहूँ....
तुम्हारा मौन
ख़तम होने तक |

रविवार, 22 जुलाई 2012

परछाईयाँ


आज फिर एक बार
अँधेरे में तलाशती रही
तुम्हारी परछाईयाँ !
जब तक तुम रहते हो
हर शब्द,
अभिव्यक्ति से पूर्ण होता है
किन्तु, बिना तुम्हारे
वो भाव, वो सामंजस्य
नहीं बैठा पाती हूँ..
शब्दों और इच्छाओं में .....
फिर भी, जो लिखूं
बनकर रह जाता है
शब्दों की भीड़,
आहत मन फिर तलाशता है...
तुम्हारी परछाईयाँ ....
इच्छाओं के इस लौह दुर्ग को
खोज है
अपनी सीमाओं की
तुमसे बंधना
तुम में गूँथ जाना ही तो
मेरी परिपूर्णता का परिचायक है,
तुमसे बंधे हर क्षण में
निहित है -
मेरे शब्दों की सार्थकता
जिसका कोई विकल्प नहीं...
कितना प्यारा सा स्वप्न है ये,
डरती हूँ, टूट न जाएँ,
ये स्वप्न, ये मनिकाएं .....
फिर से तलाश रही हूँ,
तुम्हारी परछाईयाँ ..!

गुरुवार, 21 जून 2012

माचिस कि तीलियों का एक छोटा सा पुल....
बुला रहा है मुझे
हर रोज उसकी शिकायत है
वो पूछता है बहुत कुछ.... अक्सर
और मैं?, सवालों को हंसी में घोल दिया करती हूँ
भीतर कहीं एक हिचक, एक हूक सी उठती है...
हलक तक पहुँचती नहीं कभी...
दबे पांव कहीं किसी कोने से
लपक के आ जाते हो तुम जिंदगी बन के
बातों की साझा दीवाल बुना करते हैं हम दोनों...
पत्ते सी बिछी बिछी जाती हूँ मैं
तुम तन्मय से गाते गाते रहते हो....
बहुत कुछ दहक उठता है भीतर मेरे
तुम खामोश मुस्कुराते रहते हो
उलझने बढ़ाते रहते हो ...
और, गुम हो जाते है छम से हम दोनों ..
वापस अपने अपने हिस्से की दुनिया में..
मन के आँगन से झांकती है एक तस्वीर
धुंधली सी...
जाने दूर ... कितनी दूर है वो
बरसों कि थकन है समायी मुझमे...
तुम ऊर्जा हो मेरी ...
हम दोनों की इस छोटी सी दुनिया में
नहीं जगह किसी और के लिए
छू लिया है जिंदगी को.. फिर से एक बार
एक बस, तुम्हारी वजह से !

शुक्रवार, 1 जून 2012

तुम,
एक घना वृक्ष
और मैं छाया तुम्हारी
एक अजीब सी शांति है तुम्हारे तले
जो तुमने फूलों का जाल बिछाया है,
शूल चुभते नहीं,
तुम,
समुद्र हो विशाल
मेरा सारा दर्द, सारी पीड़ा,
पी गए हो तुम,
तुम्हारा प्यार ही अब मेरा श्रृंगार है...
तुम्हारा प्यार ही अब जीने का आधार है...
सम्बन्ध आत्मा का है,
तरंगे दोनों के दिलों में उठ रही हैं,
बस इतना करना कि,
मुझे कभी खुद से अलग नहीं करना |

बुधवार, 21 मार्च 2012

मौन शब्द

कोई हलचल नहीं है अंतर्मन में अब...
सारे शब्द मौन में समा गए हैं.....
घडी की टिक टिक....और..... दूरीयाँ बढती जा रही हैं..
..और... मौन, 
शब्दों से बातें कर रहा है अब।


मंगलवार, 13 मार्च 2012

आज फिर आ जाओ मां!

आज फिर आ जाओ मां
मुझे, फिर से,
सुला जाओ मां,
जाने कहां गुम हो गाय,
टुकडा  मेरी नींद का
प्रयास अभी तक जारी है,
 
मेरे हिस्से की नींद
ढूंढ रही हूँ मैं...
कहीं पढ़ा था ..
कि माँ, ममता कि मञ्जूषा होती है .
 
एक बार फिर से अपनी आँचल कि छावं में...
एक बार फिर से ममता कि नावं में....
हिलोरें भर लेने दो माँ ..
 
आज फिर आ जाओ मां
मुझे, फिर से,
सुला जाओ मां..|
 

बुधवार, 4 जनवरी 2012

वो शख्स बहुत याद आता है ..
उसका अक्स मेरे अंदर...
दूर गहरे समाया हुआ था,
वो कभी चलता मुंडेर पर
कभी उड़ता जाता दुपहिया पर,
 
न खाने की सुध और न खबर दुनिया की  
शामिल था वो मेरे दिन रातों में ,
 
उस चिलचिलाती धूप में की थी हमने,
मुट्ठी भर कुछ  गीली  बातें, 
काली पहाड़ी के ऊंचे टीले के पीछे,
रंगे  गए कुछ सादे बादल, और
साँझ ढले हमने रची थी एक नज़्म मिलकर,
दो कतरे आंसू के बहे थे,
जो छुपा लिए थे उसने अपने दामन  में,
 
जिसका अहसास गुजरते वक़्त के साथ भी,
शामिल है धुंधली यादों में,
आज भी जब दूर कहीं बिजली चमकती है,
या फिर सूरज खनकता है काली पहाड़ी के पीछे,
वो शख्स बहुत याद आता है |