वो शख्स बहुत याद आता है ..
उसका अक्स मेरे अंदर...
दूर गहरे समाया हुआ था,
वो कभी चलता मुंडेर पर
कभी उड़ता जाता दुपहिया पर,
न खाने की सुध और न खबर दुनिया की
शामिल था वो मेरे दिन रातों में ,
उस चिलचिलाती धूप में की थी हमने,
मुट्ठी भर कुछ गीली बातें,
काली पहाड़ी के ऊंचे टीले के पीछे,
रंगे गए कुछ सादे बादल, और
साँझ ढले हमने रची थी एक नज़्म मिलकर,
दो कतरे आंसू के बहे थे, जो छुपा लिए थे उसने अपने दामन में,
जिसका अहसास गुजरते वक़्त के साथ भी,
शामिल है धुंधली यादों में,
आज भी जब दूर कहीं बिजली चमकती है,
या फिर सूरज खनकता है काली पहाड़ी के पीछे,
वो शख्स बहुत याद आता है |

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