गुरुवार, 21 जून 2012

माचिस कि तीलियों का एक छोटा सा पुल....
बुला रहा है मुझे
हर रोज उसकी शिकायत है
वो पूछता है बहुत कुछ.... अक्सर
और मैं?, सवालों को हंसी में घोल दिया करती हूँ
भीतर कहीं एक हिचक, एक हूक सी उठती है...
हलक तक पहुँचती नहीं कभी...
दबे पांव कहीं किसी कोने से
लपक के आ जाते हो तुम जिंदगी बन के
बातों की साझा दीवाल बुना करते हैं हम दोनों...
पत्ते सी बिछी बिछी जाती हूँ मैं
तुम तन्मय से गाते गाते रहते हो....
बहुत कुछ दहक उठता है भीतर मेरे
तुम खामोश मुस्कुराते रहते हो
उलझने बढ़ाते रहते हो ...
और, गुम हो जाते है छम से हम दोनों ..
वापस अपने अपने हिस्से की दुनिया में..
मन के आँगन से झांकती है एक तस्वीर
धुंधली सी...
जाने दूर ... कितनी दूर है वो
बरसों कि थकन है समायी मुझमे...
तुम ऊर्जा हो मेरी ...
हम दोनों की इस छोटी सी दुनिया में
नहीं जगह किसी और के लिए
छू लिया है जिंदगी को.. फिर से एक बार
एक बस, तुम्हारी वजह से !

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